हक़ीक़त
हर आदमी की इच्छा होतीं'है कि वह अपने परिवार को सुखी रखे लेकिन परिस्थितिया ऐसी बनती है की कभी कभी सब कुछ हाथ से निकल जाता है जो मर्यादा बच्चो के सामने बाप की होती है वह एक पल में बिखर जाती है. कोई भी आदमी अपने आप के लिए कुछ नहीं करना चाहता है या बहुत कम अपने लिए करता है लेकिन इतना तो जरूर चाहता है की वह इतना बेबस न हो की अपने आप से नजर न मिला पाए.