मध्यम वर्गीय  परिवार की मुश्किले कभी खत्म होने का नाम नहीं लेती एक खतम होती है की दूसरी शुरु  है आज मै  एक ऐसे ही परिवार की कहानी सुनाने जा रहा हू जो की बहुत ही मार्मिक है। 

एक परिवार  था जो कि आज के ज़माने के हिसाब से अपना परिवार बहुत ही मुश्किलों से चला रहा था।  वही दिनचर्या सामान्य सी, सुबह उठना काम पर जाना फिर शाम को घर लौट कर आना न ही खुद के जीवन में कोई उल्लास न ही परिवार के जीवन में कोई नयापन। यह कोई एक परिवार की कहानी नहीं है यह लगभग हर एक मध्यम वर्गीय  परिवार की कहानी है क्योकि पैसा बोलता है। 

समय  का सच 

जब बालक छोटा होता है तब पिता सोचता है कि वह ज़माने की सारी खुशिया अपने बच्चे को दे दे लेकिन नियति ऐसा होने नहीं देती, कुछ ऐसी कमी रह जाती है कि पिता चाहकर भी अपने बच्चे के लिये कर नही पाता। अनेक उदहारण है अगर हम पुरातन  को ले तो महाराज दशरथ चक्रवर्ती सम्राट होने के बावजूद अपने बालक श्री रामचंद्र जी को गुरु विश्वामित्र के साथ चौदह वर्ष की आयु में  जंगल में भेजना पड़ा था। और अंत समय में भी मन में कसक ले कर जाना पड़ा कि उन्हें अयोध्या का उत्तराधिकारी न बना सके। 

जब बालक बड़ा होता है तो वह सोचता है कि अपने पिता को अपने से ज्यादा सुख दे सकूँ लेकिन वही नियति का खेल कोई न कोई कारण जो की होने नहीं देती। पुत्र के उस दिल पर क्या बीतती है जब वह  भावुक हो कर टूट जाता है पर अपनी भावना को अंदर ही दबा कर जी रहा होता है. 

पुत्र के अपने खुद के जीवन का मध्य भाग और अपने माता पिता के चौथे भाग के जीवन के बीच  अपने को अगर सन्तुष्ट नहीं कर पाता तो इसका कष्ट केवल एक पुत्र ही महसूस कर सकता है। इसको एक कविता के माध्यम से  बताना चाहता हू। 

ख्वाब देखे मगर हम पिरो न सके ,

                                            चाहतो को धरा पर ला न सके। 

कोशिशे तो करी थी भरपूर हमने ,

                                                  मगर हम कहानी को  गा  न  सके। 


आग भरपूर दिल में जल ही रही 

                                               पानी आँखों का उसको बुझा न सकी 


आंसू पत्थर हुए उस जली आग में ,

                                                  जो की रोकर भी हम बहा न   सके.







 

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